बुधवार, 14 अप्रैल 2010

प्राकृतिक सौंदर्य


चलता ही जाता हूँ राह निहारे ,

चाहे हो पहाड़ या नदी के किनारे ।

सूरज की किरणे आसमां से आकर ,

छूती है तल को धरती में समाकर ।

लहलहाते पेड़ , खिलखिलाते फूल ,

रसपान करता भौंरा जाता सब भूल ।

चह-चहाते पच्छी , शोर मचाता सागर ,

बहती हवाएं कहती मुझसे आकर ।

की देखो ये प्रकृति के सुन्दर नज़ारे ,

खड़े है रास्ते में बांह पसारे ।

कैसी मोहक है ये प्राकृतिक सुन्दरता ,

जीवन में आनंद और लाये मधुरता ।

रोकता हूँ कलम इस सपने के साथ ,
कि प्रकृति को सवांरने में आगे बढेंगे हाथ ।


8 टिप्‍पणियां:

  1. "रोकता हूँ कलम इस सपने के साथ,
    कि प्रकृति को सवांरने में आगे बढेंगे हाथ।"
    समसामयिक एवं प्रेरक रचना - शुभकामनाएं

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  2. रचना सराहनीय है.
    ये सोच शब्द पर बिन्दी शायद भूलवश तो नहीं लग गई है?

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  3. हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं.....बधाई स्वीकार करें.....हमारे ब्लॉग पर आकर अपने विचार प्रस्तुत करें.....|

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  4. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  5. अच्छी अभिव्यक्ति है प्रकृति सच में हर मोड़ पर लुभाती है ।

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